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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 13
अन्योन्यवित्तव्यतिषङ्गवृद्ध- वैरानुबन्धो विवहन् मिथश्च । अध्वन्यमुष्मिन्नुरुकृच्छ्रवित्त- बाधोपसर्गैर्विहरन् विपन्नः ॥
इस प्रकार व्यावहारिक सम्बन्ध के कारण एक-दूसरे से द्वेषभाव बढ़ जाने पर भी वह वणिक्-समूह आपस में विवाहादि सम्बन्ध स्थापित करता है और फिर इस मार्ग में तरह-तरह के कष्ट और धनक्षय आदि संकटों को भोगते-भोगते मृतकवत्‌ हो जाता है।
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