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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 22
न ह्यद्भुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभि- र्हतांहसो भक्तिरधोक्षजेऽमला । मौहूर्तिकाद्यस्य समागमाच्च मे दुस्तर्कमूलोऽपहतोऽविवेकः ॥
आपके चरणकमलों की रज का सेवन करने से जिनके सारे पापताप नष्ट हो गये हैं, उन महानुभावों को भगवान्‌ की विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है। मेरा तो आपके दो घड़ी के सत्संग से ही सारा कुतर्क मूलक अज्ञान नष्ट हो गया है।
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