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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 17
तैर्वञ्चितो हंसकुलं समाविश- न्नरोचयन् शीलमुपैति वानरान् । तज्जातिरासेन सुनिर्वृतेन्द्रियः परस्परोद्वीक्षणविस्मृतावधिः ॥
जब उनसे धोखा उठाता है, तब हंसों की पंक्ति में प्रवेश करना चाहता है; किन्तु उसे उनका आचार नहीं सुहाता, इसलिये वानरों में मिलकर उनके जातिस्वभाव के अनुसार दाम्पत्य सुख में रत रहकर विषयभोगों से इन्द्रियों को तृप्त करता रहता है और एक-दूसरे का मुख देखते-देखते अपनी आयु की अवधि को भूल जाता है।
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