तांस्तान् विपन्नान् स हि तत्र तत्र
विहाय जातं परिगृह्य सार्थः ।
आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र
वीराध्वनः पारमुपैति योगम् ॥
हे वीरवर! साथियों में से जो-जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ-का-तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्न हुओं को साथ लिये वह बनजारों का समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है। उनमें से कोई भी प्राणी न तो आजतक वापस लौटा है और न किसी ने इस संकटपूर्ण मार्ग को पार करके परमानन्दमय योग की ही शरण ली है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
परमहंसगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
परमहंसगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।