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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 1
ब्राह्मण उवाच दुरत्ययेऽध्वन्यजया निवेशितो रजस्तमःसत्त्वविभक्तकर्मदृक् । स एष सार्थोऽर्थपरः परिभ्रमन् भवाटवीं याति न शर्म विन्दति ॥
जडभरत ने कहा - राजन्‌! यह जीवसमूह सुखरूप धमन में आसक्त देश-देशान्तर में घूम-फिरकर व्यापार करने वाले व्यापारियों के दल के समान है। इसे माया ने दुस्तर प्रवृत्तिमार्ग में लगा दिया है; इसलिये इसकी दृष्टि सात्त्विक, राजस, तामस भेद से नाना प्रकार के कर्मो पर ही जाती है। उन कर्मो में भटकता-भटकता यह संसाररूप जंगल में पहुँच जाता है। वहाँ इसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती।
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