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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 25
सौवीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्म- सतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज एवं हि नृप भगव- दाश्रिताश्रितानुभावः ॥
उनके सत्संग से परमात्मतत्त्व का ज्ञान पाकर सौवीरपति रहूगण ने भी अन्तःकरण में अविद्यावश आरोपित देहात्मबुद्धि को त्याग दिया। राजन्‌! जो लोग भगवदश्रित अनन्य भक्तों की शरण ले लेते हैं, उनका ऐसा ही प्रभाव होता है - उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती।
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