शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस आपत्ति से छुटकारा मिल जाता है तो यह फिर अपने गोल में मिल जाता है। जो मनुष्य माया की प्रेरणा से एक बार इस मार्ग में पहुँच जाता है, उसे भटकते-भटकते अन्त तक अपने परम पुरुषार्थ का पता नहीं लगता।
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