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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 19
अतः कथञ्चित्स विमुक्त आपदः पुनश्च सार्थं प्रविशत्यरिन्दम । अध्वन्यमुष्मिन्नजया निवेशितो भ्रमञ्जनोऽद्यापि न वेद कश्चन ॥
शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस आपत्ति से छुटकारा मिल जाता है तो यह फिर अपने गोल में मिल जाता है। जो मनुष्य माया की प्रेरणा से एक बार इस मार्ग में पहुँच जाता है, उसे भटकते-भटकते अन्त तक अपने परम पुरुषार्थ का पता नहीं लगता।
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