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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 7
शूरैर्हृतस्वः क्व च निर्विण्णचेताः शोचन्विमुह्यन्नुपयाति कश्मलम् । क्वचिच्च गन्धर्वपुरं प्रविष्टः प्रमोदते निर्वृतवन्मुहूर्तम् ॥
कभी अपने से अधिक बलवान्‌ लोग इसका धन छीन लेते हैं तो यह दुःखी होकर शोक और मोह से अचेत हो जाता है और कभी गन्धर्वनगर में पहुँचकर घड़ीभर के लिये सब दुःख भूलकर खुशी मनाने लगता है।
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