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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 26
राजोवाच यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहितः परोक्षेण वचसा जीवलोक- भवाध्वा स ह्यार्य मनीषया कल्पितविषयो नाञ्जसाव्युत्पन्नलोकसमधिगमः अथ तदेवैतद्दुरवगमं समवेतानुकल्पेन निर्दिश्यतामिति ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे त्रयोदशोऽऽध्यायः ॥ १३॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे परमहंसगीतायां चतुर्थोऽध्यायः ।
राजा परीक्षित ने कहा - महाभागवत मुनिश्रेष्ठ! आप परम विद्वान्‌ हैं। आपने रूपकादि के द्वारा अप्रत्यक्षरूप से जीवों के जिस संसाररूप मार्ग का वर्णन किया है, उस विषय की कल्पना विवेकी पुरुषों की बुद्धि ने की है; वह अल्पबुद्धि वाले पुरुषों की समझ में सुगमता से नहीं आ सकता। अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषय को रूपक का स्पष्टीकरण करने वाले शब्दों से खोलकर समझाइये।
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