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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 15
मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्रा ममेति सर्वे भुवि बद्धवैराः । मृधे शयीरन् न तु तद्व्रजन्ति यन्न्यस्तदण्डो गतवैरोऽभियाति ॥
जिन्होंने बड़े-बड़े दिकक्‍्पालों को जीत लिया है, वे धीर-वीर पुरुष भी पृथ्वी में 'यह मेरी है' ऐसा अभिमान करके आपस में वैर ठानकर संग्रामभूमि में जूझ जाते हैं तो भी उन्हें भगवान्‌ विष्णु का वह अविनाशी पद नहीं मिलता, जो वैरहीन परमहंसों को प्राप्त होता है।
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