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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 4
निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि- स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम् । क्वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूम्रा दिशो न जानाति रजस्वलाक्षः ॥
यह वणिक्‌-समुदाय इस वन में निवासस्थान, जल और धनादि में आसक्त होकर इधर-उधर भटकता रहता है। कभी बवंडर से उठी हुई धूल के द्वारा जब सारी दिशाएँ धूमाच्छादित-सी हो जाती हैं और इसकी आँखों में भी धूल भर जाती है तो इसे दिशाओं का ज्ञान भी नहीं रहता।
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