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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 6
क्वचिद्वितोयाः सरितोऽभियाति परस्परं चालषते निरन्धः । आसाद्य दावं क्वचिदग्नितप्तो निर्विद्यते क्व च यक्षैर्हृतासुः ॥
कभी जलहीन नदियों की ओर जाता है, कभी अन्न न मिलने पर आपस में एक-दूसरे से भोजनप्राप्ति की इच्छा करता है, कभी दावानल में घुसकर अग्नि से झुलस जाता है और कभी यक्षलोग इसके प्राण खींचने लगते हैं तो यह खिन्‍न होने लगता है।
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