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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 9
क्वचिन्निगीर्णोऽजगराहिना जनो नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्धः । दष्टः स्म शेते क्व च दन्दशूकै- रन्धोऽन्धकूपे पतितस्तमिस्रे ॥
कभी अजगर सर्प का ग्रास बनकर वन में फेंके हुए मुर्दे के समान पड़ा रहता है। उस समय इसे कोई सुध-बुध नहीं रहती। कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विष के प्रभाव से अन्धा होकर किसी अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकार में बेहोश पड़ा रहता है।
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