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अध्याय 3 — घटस्तवः

पञ्चस्तवी
24 श्लोक • केवल अनुवाद
हे विश्व-उल्लासनादि क्रीडा करने वाली देवी। हे महादेव की पत्नी! हे पार्वती! हे सती! हे तीनों लोकों की माता! हे कल्याण करने वाली! हे दुष्टों को नष्ट करने वाली! हे तीन लोकों को पूर्ण करने वाली! हे पारमार्थिक सुख देने वाली! हे भक्तों को अभीष्ट वर देने वाली! हे स्वरूप-गोपन और स्वरूप-विकास करने वाली! हे कत्य-ऋषि की कन्या! हे भयंकर स्वरूप को धारण करने वाली! हे भैरवनाथ की अर्धांगिनी! हे चण्डिका का स्वरूप धारण करने वाली! हे कालरात्री भगवती! हे सर्वत्र स्वतंत्र रूप वाली! हे काल को नष्ट करने वाली देवी! हे त्रिशूल को धारण करने वाली! हम एकाग्रमन से युक्त बने हुए आपके चरण-कमलों को प्रणाम करते हैं। हम सब ओर से व्याकुल बने हुए हैं। आप हमारी रक्षा कीजिए।
जो भाग्यशाली जन मदान्ध व्यक्ति की भांति, हठीले मनुष्य की तरह, विष-आसक्त मूर्च्छित-जन की तरह, प्राप्त किये हुए गंभीर हर्ष की भांति, अत्यन्त विरह से विरही पुरुष की तरह अथवा व्याकुल बने हुए मनुष्य की नाईं आप गिरिजा का ध्यान करते हैं, उनका ध्यान सुन्दर नेत्रों वाली योगिनियां एकाग्रतापूर्वक करती रहती हैं, जो समस्त उपाधियों से रहित होती हैं और जो उन्नत हृदय वाली होती हैं। भाव यह है कि उस साधक की सभी उपाधियों को तिलांजलि देकर उन्नत हृदय से वे योगिनियां उसके वशवर्ती बन जाती हैं।
हे द्योतनात्मिका देवि ! जो भक्त एक बार भी आपको प्रणाम करता है अर्थात् अपने जीवन में एक बार भी आप का साक्षात्कार करता है, उसके सम्मुख बड़े-बड़े सम्राट् जीवन-पर्यन्त झुकते रहते हैं। जिन सम्राटों की चरण पादुका पर अनेकानेक गणराज्यों के मुकुटों के अग्रभाग की छटायें लगी रहती हैं, अर्थात् जिनके चरणों पर अनेक राजे झुके रहते हैं। हे देवी! जो आपकी पूजा हृदय से करता है, वह देवताओं के द्वारा पूजित होता है, जो आपकी स्तुति करता है उसकी स्तुति सारा जगत् करता रहता है और जो आपका ध्यान करता है उसका ध्यान सभी इन्द्रिय-वृत्तियां करती रहती हैं अर्थात् उस साधक को एकाग्र बनाने में सहायक होती हैं ।
हे त्रिपुरा भगवती ! जो भक्त-जन अपने हृदय में आपका ध्यान एक क्षण के लिये भी करते हैं, वे भले ही सौन्दर्य, यौवन तथा धन से रहित क्यों न हों, वे पुरुष सुन्दर तथा दीर्घ नेत्रों वाली योगिनियों के हृदयरूपी भित्ति पर सदा के लिए अंकित बने रहते हैं, भाव यह है कि योगिनियां उनको अपने हृदय में स्थान देती हैं और वे महायोगिनी मेलाप का उच्चतर अधिकार प्राप्त करते हैं।
हे देवी! जिस भक्त के हृदय में आप प्रकट होती हैं, उसे (योषित्-जन) परमेश्वर का शक्ति-चक्र यही चाहता है कि "हम इसे देखते ही अर्थात् नेत्रों के द्वारा ही पियें, अपने नेत्रों का स्थान बनायें, अथवा इसके अंगों में अपने सभी अंग समायें, अर्थात् इसकी परिमित प्रमातृता को समाप्त करके अपनी अपरिमित स्वात्मस्थिति प्रदान करें, या इसे हम एकबारगी ही निगल लें और अपने साथ इसको एक बनायें।" इस भांति अनेकानेक कल्पनाओं के वशवर्ती बनकर भिन्न-भिन्न प्रणालियों से वे परमेश्वर की शक्तियां इसके साथ-साथ ही रहने की इच्छा करती हैं। सच तो यह है कि भक्त के हृदय में आपका प्रविष्ट होना ही अनेकानेक कार्यों की सिद्धि का परिचायक है ।
हे तीनों लोकों को उत्पन्न करने वाली देवि ! जिस भांति 'ईश्वर' यह शब्द महादेव में लागू होता है, उसी भांति 'शक्ति'- यह शब्द भी तथ्य रूप से आपका परिचायक है। इतना होने पर अर्थात् सर्व-समर्थ होने पर भी आपके भक्तों को तुच्छ रोगादि, बाधा डालते ही रहते हैं और आप उन रोग आदि आपदाओं को अपने क्रोध से नष्ट नहीं करती हैं - यह तो बड़ा आश्चर्य है।
हे पार्वती देवि । आप चन्द्रमा में अवस्थित मृगलांछन के समान सुन्दर और प्रफुल्लित श्वेत कमल रूपी आसन में विराजमान हैं। आप तेल से प्रपूरित दीपक की चमक की भांति सर्वतः प्रकाश-पूर्ण हैं। आप सदा अमृत की वर्षा करती रहती हैं - इस प्रकार जो आपके स्वरूप का ध्यान करते हैं, वे सदा के लिए रोगों से मुक्त होते हैं और समस्त आपदायें उन्हें अपने से दूर रखती हैं। भाव यह है कि दुःख उनके सामने नहीं फटकने पाते।
पूनम के चमकते हुए चन्द्रमा की नाईं, अधिक मात्रा में बहते हुए अमृत के झरनों की भांति, क्षीर-समुद्र के अधिकाधिक लहरों की भांति, अमृतरूपी मिट्टी के गोलों को तरह या हिम की नाईं निर्मित आपका श्वेत स्वरूप का ध्यान जो श्रद्धा-पूर्वक करते हैं, वे अपने हृदय में ही पीड़ा आपदाओं तथा दयनीयता को नष्ट करके मोक्ष-रूपिणी संपदा अर्थात् मोक्षलक्ष्मी को धारण करते हैं।
अकस्मात् अपनी इच्छा शक्ति से ही प्रकट होने वाली, मत्स्योदरी की भांति सर्वदा स्पन्दन-शील, पांच ग्रन्थियों (मूलाधार, नाभि, हृदय, कण्ठ और भ्रूमध्य) का भेदन करने वाली, बाल-सूर्य के समान रक्त-वर्ण वाली तथा समस्त जगत को लालिमा-पूर्ण भक्ति-सागर में डुबो देनेवाली आप जगदीश्वरी का ध्यान जो भक्त, भली भांति करते हैं, उन्हें हिरण के समान चंचल नेत्रों वाली करणेश्वरी देवियां अपने हृदय में सदा के लिये स्थान देती हैं अर्थात् उन्हें इन्द्रिय-वृत्तियों के व्यवहार-दशा में ही स्वरूप-लाभ-संपत्र बनाती हैं।
हे भवानि ! जो भक्त, लाख के रस में भिगोये हुए कमल के सूत के समान अत्यन्त सूक्ष्म और लालिमा से युक्त आपके स्वरूप का स्मरण अपने हृदय में प्रतिदिन करता है, उसे कामदेव के समान सुन्दर मानकर अत्यन्त अद्वितीय सौन्दर्य वाली और हिरण के समान सुन्दर नेत्रों वाली युवतियां अपने नेत्र रूपी कमलों के द्वारा उपासना करती हैं। भाव यह है कि उस भक्त की सभी करणेश्वरी शक्तियां उसे प्रथमाभास-धाम में ही स्थित करती हैं, जिसके फलस्वरूप वह भक्त, सदा के लिए आपके चिदानन्द-स्वरूप में लय हो जाता है।
बर्फ, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा की नाईं श्वेत तथा निर्मल प्रकाश से युक्त बनी हुई तथा चरणों तक लटकती हुई कदम्ब-पुष्पों की माला को धारण करने वाली आप, अव्यक्त परावाणी की हम स्तुति करते हैं।
हे महादेव की शक्ति देवी ! आप भगवान् शिवरूपी अत्यन्त श्वेत कमल-स्वरूप आसन पर विराजमान हैं। आप बर्फ जैसी श्वेत दीप्ति वाली हैं। आप ब्रह्मस्थान के अधोवक्त्र मूलाधार में और ऊर्ध्ववक्त्र ब्रह्मरन्ध्र में परमानन्द रूपी अमृत को वर्षा करती हैं। इस प्रकार जो भक्त-जन, आपका ध्यान करते हैं, उनकी वाणी निरन्तर रूप से मनोहर, सुन्दर तथा (सभी दोषों से रहित होने के फलस्वरूप) निर्मल बनी हुई सब ओरं प्रसारित होती हैं अर्थात् वे भक्त उच्चकोटि की कवित्वशक्ति प्राप्त करते हैं।
देवी यदि एक बार भी (भक्त के द्वारा) ध्यान की गई हो तो वह उस भक्त को अभिलषित भोगों को देती है। शत्रुओं को नष्ट करती है। विपदाओं को मार भगाती है। मानसिक पीड़ाओं को जला देती है। शारीरिक रोगों का शमन करती है। सुखों को बढ़ाती है अर्थात् सुख ही सुख देती है। आन्तरिक दुःखों को हठ-पूर्वक नष्ट करती है और अभीष्ट की अप्राप्ति को पीस डालती है। इस प्रकार अपने भक्त की कौन-सी चाही हुई इच्छा को पूरा नहीं करती।
हे महादेव की प्रिय भगवती ! जो भक्त आपका ध्यान करे, आपको भली भांति जाने, आपको प्राप्त करे, आपका जप करे और आपका साक्षात्कार करे, एवं आपका चिन्तन करे, आपके स्वरूपानुसंधान करने में तत्पर रहे, आपकी स्तुति करे या आपका आश्रय ग्रहण करे, आपकी पूजा करे अथवा बड़े आदर से आपके गुणों का श्रवण करे, उसके घर से सांसारिक और मोक्षप्रदा लक्ष्मी कभी नहीं भागती और विजय-लक्ष्मी उस भक्त के आगे-आगे दौड़ती रहती है।
हे राक्षसों को मारने वाली। आपका स्मरण करने पर कौन से दुःख नष्ट नहीं होते। हे जगत रूपी कुल में कमल के समान आह्वाद देने वाली ! आपको स्तुति करने पर कौन-सी कीर्ति प्राप्त नहीं होती। हे देववर इन्द्र के द्वारा स्तुति की गई भगवती ! आपकी अर्चना करने पर कौन-सी सिद्धि प्रकट नहीं होती और जिस भक्त ने अपने हृदय में आपको स्थान दिया हो तो उसे कौन सा योग प्राप्त नहीं होता, अर्थात् वह भक्त योग की सभी सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। यह है आपकी नाम-स्मरण की महिमा।
हे देवी ! जो जन भयंकर काल के मुख में प्रविष्ट हुए हों, हे काली ! जो महाकाल के घने तथा दृढ़ फण-पाश में भली भांति बान्चे गये हों, और हे चण्डी ! जो भयंकर पाप रूपी समुद्र में डूब गये हों, वे यदि वैसी आपत्तियों में आपका स्मरण करें तो आप (क्रम-पूर्वक) उन्हें महाकाल के मुख में जाने से रक्षा करती हैं, मृत्यु की जंजीरों से छुटकारा दिलाती हैं और पाप रूपी समुद्र से पार ले जाती हैं।
हे देवी ! आपके चरण-कमलों की धूलि लक्ष्मी-वशीकरण-रूपी चूर्ण की सगी बहिन है, अतः वह धूलि अनन्त समय के लिए विजयिनी है। वही धूलि के कण आपको प्रणाम करने के समय मनुष्यों के मस्तक में केवल लगने से ही भाग्य में लिखित बुरे अक्षरों को एक क्षण में मिटा देती है। भाव यह है कि आपके चरणों में नतमस्तक होकर मस्तक में लिखे हुए बुरे अक्षर एक बारगी मिट जाते हैं।
हे मूर्ख पुरुषो! तुम व्यर्थ ही तपस्या करके भला क्यों अपने शरीर को दुःख देते हो? यज्ञादिकों में ब्राह्मणों को बहुत दक्षिणा देकर अथवा अन्यान्य (दानादिकों) को देकर अपने घरों को क्यों संपत्ति-रहित बना देते हो? यदि तुम में नाश रहित भक्ति है और तुम भगवती के चरणों का सेवन करोगे तो प्रफुल्लित कमल-पत्रों की तरह सुन्दर बनी हुई मोक्षलक्ष्मी तुम्हारे आगे-आगे दौड़ेगी, अर्थात् तुम उस मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करोगे।
मैं किसी से न तो कोई वस्तु मांगता ही हूं, न किसी को धोखा देकर धन प्राप्त करता हूं और न किसी की दास-वृत्ति ही करता हूं, अतः मैंने सभी दौनता दूर को है। किन्तु आश्चर्य यह है कि न मांगने पर भी मैं रेशमी आदि कोमल वस्त्र ही पहनता हूं, मधुर स्वादिष्ट भोजन ही खाता हूं और सर्वोत्तर पराशक्ति का ही सेवन करता हूं। हे देवि ! वस्तुतः यह सभी प्रभाव मुझे तभी प्राप्त है जबकि आप मेरे हृदय में विकसित होकर स्वार्गिक कामधेनु की भांति विराजमान रहती हैं।
हे शब्दब्रह्म-स्वरूपा परा देवी! हे निर्मल त्रिपुरा देवी! हे परमेश्वरी! मैं अपनी शक्ति के अनुसार जो भी पूजा अथवा जप करता हूं, उसे आप (सहर्ष) स्वीकार कीजिए।
सभी साधक-जन अर्थात् भक्त जन प्रसन्न रहें ! सारे विघ्न नष्ट हो जायें। शाम्भवी परा अवस्था मुझे प्राप्त हो और गुरु देव मुझ पर सदा प्रसन्न रहें (यही अभिलाषा है) ।
आप जगदम्बा त्रिपुरसुन्दरी भगवती दर्शन-मात्र से ही सभी पापों को नष्ट करती हैं, जप करने से मृत्यु का नाश करती हैं अर्थात् मुक्त बना देती हैं और पूजा करने से समस्त दुःखों तथा कुभाग्यों को दूर करती हैं।
मैं चन्द्र-लेखा से सुशोभित बनाये हुए केशों अर्थात् शक्ति-चक्रों से युक्त बनी हुई पार्वती भगवती को नमस्कार करता हूं जो संसार के दुःखों को हटाने में अमृत की नदी के समान सुख देने वाली है।
हे परमेश्वरी देवी ! मन्त्र-रहित, क्रिया-रहित अथवा विधि-रहित जो कुछ भी मुझसे हुआ है, हे माता ! आप उस सब कुछ के लिए कृपा करके मुझे क्षमा कीजिए।
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