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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 15
किं किं दुःखं दनुजदलिनि ! क्षीयते न स्मृतायां का का कीर्तिः कुलकमलिनि ! ख्याप्यते न स्तुतायाम् का का सिद्धिः सुरवरनुते ! प्राप्यते नार्चितायां कं कं योगं त्वयि न चिनुते चित्तमालम्बितायाम् ।।
हे राक्षसों को मारने वाली। आपका स्मरण करने पर कौन से दुःख नष्ट नहीं होते। हे जगत रूपी कुल में कमल के समान आह्वाद देने वाली ! आपको स्तुति करने पर कौन-सी कीर्ति प्राप्त नहीं होती। हे देववर इन्द्र के द्वारा स्तुति की गई भगवती ! आपकी अर्चना करने पर कौन-सी सिद्धि प्रकट नहीं होती और जिस भक्त ने अपने हृदय में आपको स्थान दिया हो तो उसे कौन सा योग प्राप्त नहीं होता, अर्थात् वह भक्त योग की सभी सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। यह है आपकी नाम-स्मरण की महिमा।
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