मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 1
देवि ! त्र्यम्बकपत्नि ! पार्वति ! सति ! त्रैलोक्यमातः ! शिवे ! शर्वाणि ! त्रिपुरे ! मृड़ानि ! बरदे ! रुद्राणि ! कात्यायनि !! भीमे ! भैरवि ! चण्डि ! शर्वरि ! कले ! कालक्षये ! शूलिनि ! त्वत्पादप्रणतानऽनन्यमनसः पर्याकुलान्पाहि नः ।।
हे विश्व-उल्लासनादि क्रीडा करने वाली देवी। हे महादेव की पत्नी! हे पार्वती! हे सती! हे तीनों लोकों की माता! हे कल्याण करने वाली! हे दुष्टों को नष्ट करने वाली! हे तीन लोकों को पूर्ण करने वाली! हे पारमार्थिक सुख देने वाली! हे भक्तों को अभीष्ट वर देने वाली! हे स्वरूप-गोपन और स्वरूप-विकास करने वाली! हे कत्य-ऋषि की कन्या! हे भयंकर स्वरूप को धारण करने वाली! हे भैरवनाथ की अर्धांगिनी! हे चण्डिका का स्वरूप धारण करने वाली! हे कालरात्री भगवती! हे सर्वत्र स्वतंत्र रूप वाली! हे काल को नष्ट करने वाली देवी! हे त्रिशूल को धारण करने वाली! हम एकाग्रमन से युक्त बने हुए आपके चरण-कमलों को प्रणाम करते हैं। हम सब ओर से व्याकुल बने हुए हैं। आप हमारी रक्षा कीजिए।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें