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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 18
रे मूढाः ! किमयं वृथैव तपसा कायः परिक्लिश्यते यज्ञैर्वा बहुदक्षिणैः किमितरे रिक्तीक्रियन्ते गृहाः। भक्तिश्चेदविनाशिनी भगवतीपादद्वयी सेव्यता- मुन्निद्राम्बुरुहातपत्रसुभगा लक्ष्मीः पुरोधावति ।।
हे मूर्ख पुरुषो! तुम व्यर्थ ही तपस्या करके भला क्यों अपने शरीर को दुःख देते हो? यज्ञादिकों में ब्राह्मणों को बहुत दक्षिणा देकर अथवा अन्यान्य (दानादिकों) को देकर अपने घरों को क्यों संपत्ति-रहित बना देते हो? यदि तुम में नाश रहित भक्ति है और तुम भगवती के चरणों का सेवन करोगे तो प्रफुल्लित कमल-पत्रों की तरह सुन्दर बनी हुई मोक्षलक्ष्मी तुम्हारे आगे-आगे दौड़ेगी, अर्थात् तुम उस मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करोगे।
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