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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 14
यस्त्वां ध्यायति वेत्ति विन्दति जपत्यालोकते चिन्तय- त्यन्चेति प्रतिपद्यते कलयति स्तौत्याश्रयत्यर्चति । यश्च त्र्यम्बकवल्लभे ! तव गुणानाकर्णयत्यादरा- त्तस्य श्रीर्न गृहादपैति विजयस्तस्याग्रतो धावति ।।
हे महादेव की प्रिय भगवती ! जो भक्त आपका ध्यान करे, आपको भली भांति जाने, आपको प्राप्त करे, आपका जप करे और आपका साक्षात्कार करे, एवं आपका चिन्तन करे, आपके स्वरूपानुसंधान करने में तत्पर रहे, आपकी स्तुति करे या आपका आश्रय ग्रहण करे, आपकी पूजा करे अथवा बड़े आदर से आपके गुणों का श्रवण करे, उसके घर से सांसारिक और मोक्षप्रदा लक्ष्मी कभी नहीं भागती और विजय-लक्ष्मी उस भक्त के आगे-आगे दौड़ती रहती है।
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