मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 9
ये संस्मरन्ति तरलां सहसोल्लसन्तीं त्वां ग्रन्थिपञ्चकभिदं तरुणार्कशोणाम्। रागार्णवे बहलरागिणि मज्जयन्तीं कृत्स्नं जगद्दधति चेतसि तान्मृगाक्ष्यः।।
अकस्मात् अपनी इच्छा शक्ति से ही प्रकट होने वाली, मत्स्योदरी की भांति सर्वदा स्पन्दन-शील, पांच ग्रन्थियों (मूलाधार, नाभि, हृदय, कण्ठ और भ्रूमध्य) का भेदन करने वाली, बाल-सूर्य के समान रक्त-वर्ण वाली तथा समस्त जगत को लालिमा-पूर्ण भक्ति-सागर में डुबो देनेवाली आप जगदीश्वरी का ध्यान जो भक्त, भली भांति करते हैं, उन्हें हिरण के समान चंचल नेत्रों वाली करणेश्वरी देवियां अपने हृदय में सदा के लिये स्थान देती हैं अर्थात् उन्हें इन्द्रिय-वृत्तियों के व्यवहार-दशा में ही स्वरूप-लाभ-संपत्र बनाती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें