अकस्मात् अपनी इच्छा शक्ति से ही प्रकट होने वाली, मत्स्योदरी की भांति सर्वदा स्पन्दन-शील, पांच ग्रन्थियों (मूलाधार, नाभि, हृदय, कण्ठ और भ्रूमध्य) का भेदन करने वाली, बाल-सूर्य के समान रक्त-वर्ण वाली तथा समस्त जगत को लालिमा-पूर्ण भक्ति-सागर में डुबो देनेवाली आप जगदीश्वरी का ध्यान जो भक्त, भली भांति करते हैं, उन्हें हिरण के समान चंचल नेत्रों वाली करणेश्वरी देवियां अपने हृदय में सदा के लिये स्थान देती हैं अर्थात् उन्हें इन्द्रिय-वृत्तियों के व्यवहार-दशा में ही स्वरूप-लाभ-संपत्र बनाती हैं।
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