ध्यायन्ति ये क्षणमपि त्रिपुरे ! हृदि त्वां लावण्ययौवनधनैरपि विप्रयुक्ताः। ते विस्फुरन्ति ललितायतलोचनानां चित्तैकभित्तिलिखितप्रतिमाः पुर्मासः ।।
हे त्रिपुरा भगवती ! जो भक्त-जन अपने हृदय में आपका ध्यान एक क्षण के लिये भी करते हैं, वे भले ही सौन्दर्य, यौवन तथा धन से रहित क्यों न हों, वे पुरुष सुन्दर तथा दीर्घ नेत्रों वाली योगिनियों के हृदयरूपी भित्ति पर सदा के लिए अंकित बने रहते हैं, भाव यह है कि योगिनियां उनको अपने हृदय में स्थान देती हैं और वे महायोगिनी मेलाप का उच्चतर अधिकार प्राप्त करते हैं।
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