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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 8
पूर्णेन्दोः शकलैरिवातिबहलैः पीयूषपूरैरिव क्षीराब्धेर्लहरी भरैरिव सुधापङ्कस्य पिण्डैरिव। प्रालेयैरिव निर्मितं तव वपुर्ध्यायन्ति ये श्रद्धया चित्तान्तर्निहतार्तितापविपदस्ते सम्पदं बिभ्रति ।।
पूनम के चमकते हुए चन्द्रमा की नाईं, अधिक मात्रा में बहते हुए अमृत के झरनों की भांति, क्षीर-समुद्र के अधिकाधिक लहरों की भांति, अमृतरूपी मिट्टी के गोलों को तरह या हिम की नाईं निर्मित आपका श्वेत स्वरूप का ध्यान जो श्रद्धा-पूर्वक करते हैं, वे अपने हृदय में ही पीड़ा आपदाओं तथा दयनीयता को नष्ट करके मोक्ष-रूपिणी संपदा अर्थात् मोक्षलक्ष्मी को धारण करते हैं।
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