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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 7
इन्दोर्मध्यगतां मृगाङ्कसदृशच्छायां मनोहारिणीं पाण्डू त्फुल्लसरोरुहासनगतां स्निग्धप्रदीपच्छविम्। वर्षन्तीममृतं भवानि ! भवतीं ध्यायन्ति ये देहिन- स्ते निर्मुक्तरुजो भवन्ति विपदः प्रोज्झन्ति तान्दूरतः ।।
हे पार्वती देवि । आप चन्द्रमा में अवस्थित मृगलांछन के समान सुन्दर और प्रफुल्लित श्वेत कमल रूपी आसन में विराजमान हैं। आप तेल से प्रपूरित दीपक की चमक की भांति सर्वतः प्रकाश-पूर्ण हैं। आप सदा अमृत की वर्षा करती रहती हैं - इस प्रकार जो आपके स्वरूप का ध्यान करते हैं, वे सदा के लिए रोगों से मुक्त होते हैं और समस्त आपदायें उन्हें अपने से दूर रखती हैं। भाव यह है कि दुःख उनके सामने नहीं फटकने पाते।
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