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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 6
विश्वव्यापिनि यद्वदीश्वर इति स्थाणावनन्याश्रयः शब्दः शक्तिरिति त्रिलोकजननि ! त्वय्येव तथ्यस्थितिः। इत्थं सत्यपि शक्नुवन्ति यदिमाः क्षुद्रा रुजो बाधितुं त्वद्भक्तानपि न क्षिणोषि च रुषा तद्देवि ! चित्रं महत् ।।
हे तीनों लोकों को उत्पन्न करने वाली देवि ! जिस भांति 'ईश्वर' यह शब्द महादेव में लागू होता है, उसी भांति 'शक्ति'- यह शब्द भी तथ्य रूप से आपका परिचायक है। इतना होने पर अर्थात् सर्व-समर्थ होने पर भी आपके भक्तों को तुच्छ रोगादि, बाधा डालते ही रहते हैं और आप उन रोग आदि आपदाओं को अपने क्रोध से नष्ट नहीं करती हैं - यह तो बड़ा आश्चर्य है।
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