ददातीष्टान्भोगान्क्षपयति रिपून्हन्ति विपदो दहत्याधीन्व्याधीञ्छमयति सुखानि प्रतनुते । हठादन्तर्दुःखं दलयति पिनष्टीष्टविरहं सकृद्धचाता देवी किमिव निरवद्यं न कुरुते ।।
देवी यदि एक बार भी (भक्त के द्वारा) ध्यान की गई हो तो वह उस भक्त को अभिलषित भोगों को देती है। शत्रुओं को नष्ट करती है। विपदाओं को मार भगाती है। मानसिक पीड़ाओं को जला देती है। शारीरिक रोगों का शमन करती है। सुखों को बढ़ाती है अर्थात् सुख ही सुख देती है। आन्तरिक दुःखों को हठ-पूर्वक नष्ट करती है और अभीष्ट की अप्राप्ति को पीस डालती है। इस प्रकार अपने भक्त की कौन-सी चाही हुई इच्छा को पूरा नहीं करती।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।