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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 17
लक्ष्मीवशीकरणचूर्णसहोदराणि त्वत्पादपङ्कजरजांसि चिरं जयन्ति । यानि प्रणाममिलितानि नृणां ललाटे लुम्पन्ति दैवलिखितानि दुरक्षराणि ।।
हे देवी ! आपके चरण-कमलों की धूलि लक्ष्मी-वशीकरण-रूपी चूर्ण की सगी बहिन है, अतः वह धूलि अनन्त समय के लिए विजयिनी है। वही धूलि के कण आपको प्रणाम करने के समय मनुष्यों के मस्तक में केवल लगने से ही भाग्य में लिखित बुरे अक्षरों को एक क्षण में मिटा देती है। भाव यह है कि आपके चरणों में नतमस्तक होकर मस्तक में लिखे हुए बुरे अक्षर एक बारगी मिट जाते हैं।
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