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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 23
नमामि यामिनीनाथलेखालङ्कृतकुन्तलाम्। भवानीं भवसन्तापनिर्वापणसुधानदीम् ।।
मैं चन्द्र-लेखा से सुशोभित बनाये हुए केशों अर्थात् शक्ति-चक्रों से युक्त बनी हुई पार्वती भगवती को नमस्कार करता हूं जो संसार के दुःखों को हटाने में अमृत की नदी के समान सुख देने वाली है।
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