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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 5
एतं किंनुदृशा पिबाम्युत विशाम्यस्याङ्गमङ्गैर्निजैः किं वाऽमुं निगलाम्यनेन सहसा कि वैकतामाश्रये। तस्येत्थं विवशोविकल्पघटनाकूतेन योषिज्जनः किं तद्यन्न करोति देवि ! हृदये यस्य त्वमावर्तसे ।।
हे देवी! जिस भक्त के हृदय में आप प्रकट होती हैं, उसे (योषित्-जन) परमेश्वर का शक्ति-चक्र यही चाहता है कि "हम इसे देखते ही अर्थात् नेत्रों के द्वारा ही पियें, अपने नेत्रों का स्थान बनायें, अथवा इसके अंगों में अपने सभी अंग समायें, अर्थात् इसकी परिमित प्रमातृता को समाप्त करके अपनी अपरिमित स्वात्मस्थिति प्रदान करें, या इसे हम एकबारगी ही निगल लें और अपने साथ इसको एक बनायें।" इस भांति अनेकानेक कल्पनाओं के वशवर्ती बनकर भिन्न-भिन्न प्रणालियों से वे परमेश्वर की शक्तियां इसके साथ-साथ ही रहने की इच्छा करती हैं। सच तो यह है कि भक्त के हृदय में आपका प्रविष्ट होना ही अनेकानेक कार्यों की सिद्धि का परिचायक है ।
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