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पञ्चस्तवी • अध्याय 3 • श्लोक 19
याचे न कंचन न कंचन वञ्चयामि सेवे न कंचन निरस्तसमस्तदैन्यः । श्लक्ष्णं वसे मधुरमद्मि भजे वरस्त्रींदेवी हृदि स्फुरति मे कुलकामधेनुः ।।
मैं किसी से न तो कोई वस्तु मांगता ही हूं, न किसी को धोखा देकर धन प्राप्त करता हूं और न किसी की दास-वृत्ति ही करता हूं, अतः मैंने सभी दौनता दूर को है। किन्तु आश्चर्य यह है कि न मांगने पर भी मैं रेशमी आदि कोमल वस्त्र ही पहनता हूं, मधुर स्वादिष्ट भोजन ही खाता हूं और सर्वोत्तर पराशक्ति का ही सेवन करता हूं। हे देवि ! वस्तुतः यह सभी प्रभाव मुझे तभी प्राप्त है जबकि आप मेरे हृदय में विकसित होकर स्वार्गिक कामधेनु की भांति विराजमान रहती हैं।
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