उन्मत्ता इव सग्रहा इव विषव्यासक्तमूर्च्छा इव प्राप्तप्रौढमदा इवाति विरहग्रस्ता इवार्ता इव। ये ध्यायन्ति हि शैलराजतनयां धन्यास्त एकाग्रतस्त्यक्तोपाधिविवृद्धरागमनसो ध्यायन्ति वामध्रुवः ।।
जो भाग्यशाली जन मदान्ध व्यक्ति की भांति, हठीले मनुष्य की तरह, विष-आसक्त मूर्च्छित-जन की तरह, प्राप्त किये हुए गंभीर हर्ष की भांति, अत्यन्त विरह से विरही पुरुष की तरह अथवा व्याकुल बने हुए मनुष्य की नाईं आप गिरिजा का ध्यान करते हैं, उनका ध्यान सुन्दर नेत्रों वाली योगिनियां एकाग्रतापूर्वक करती रहती हैं, जो समस्त उपाधियों से रहित होती हैं और जो उन्नत हृदय वाली होती हैं। भाव यह है कि उस साधक की सभी उपाधियों को तिलांजलि देकर उन्नत हृदय से वे योगिनियां उसके वशवर्ती बन जाती हैं।
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