ये देवि ! दुर्धरकृतान्तमुखान्तरस्थाः ये कालि ! कालघनपाशनितान्त बद्धाः। ये चण्डि ! चण्डगुरुकल्मषसिन्धुमग्ना- स्तान्पासि मोचयसि तारयसि स्मृतैव ।।
हे देवी ! जो जन भयंकर काल के मुख में प्रविष्ट हुए हों, हे काली ! जो महाकाल के घने तथा दृढ़ फण-पाश में भली भांति बान्चे गये हों, और हे चण्डी ! जो भयंकर पाप रूपी समुद्र में डूब गये हों, वे यदि वैसी आपत्तियों में आपका स्मरण करें तो आप (क्रम-पूर्वक) उन्हें महाकाल के मुख में जाने से रक्षा करती हैं, मृत्यु की जंजीरों से छुटकारा दिलाती हैं और पाप रूपी समुद्र से पार ले जाती हैं।
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