मूर्धीन्दोः सितपङ्कजासनगतां प्रालेयपाण्डुत्विषं वर्षन्तीममृतं सरोरुहभुवो वक्त्रेऽपि रन्धेऽपि च। अच्छिन्ना च मनोहरा च ललिता चातिप्रसन्नाऽपि च त्वामेव स्मरतां स्मरारिदयिते ! वाक् सर्वतो वल्गति ।।
हे महादेव की शक्ति देवी ! आप भगवान् शिवरूपी अत्यन्त श्वेत कमल-स्वरूप आसन पर विराजमान हैं। आप बर्फ जैसी श्वेत दीप्ति वाली हैं। आप ब्रह्मस्थान के अधोवक्त्र मूलाधार में और ऊर्ध्ववक्त्र ब्रह्मरन्ध्र में परमानन्द रूपी अमृत को वर्षा करती हैं। इस प्रकार जो भक्त-जन, आपका ध्यान करते हैं, उनकी वाणी निरन्तर रूप से मनोहर, सुन्दर तथा (सभी दोषों से रहित होने के फलस्वरूप) निर्मल बनी हुई सब ओरं प्रसारित होती हैं अर्थात् वे भक्त उच्चकोटि की कवित्वशक्ति प्राप्त करते हैं।
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