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अध्याय 4 — वैधसंन्यासयोग
गणेशगीता
37 श्लोक • केवल अनुवाद
वरेण्य बोले - हे भगवन्! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् निष्कामभाव से कर्म करते-करते विशुद्ध चित्त होने पर कर्मत्याग करने) को ज्ञान का कारण कहकर फिर कर्मयोग को ज्ञान का कारण कहते हैं, इन दोनों में जो हितकारी हो, उसे कहिये।
श्रीगणेशजी बोले - (अधिकारियों के भेद से) कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों ही मुक्ति के साधन हैं, उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग में विशेषता है।
जो द्वन्द्व और दुःख को सहकर किसी से द्वेष नहीं करता और किसी बात की इच्छा नहीं करता, ऐसा प्राणी अनायास तत्काल कर्मबन्धन से सदा मुक्त हो जाता है।
कर्मसंन्यास और कर्मयोग को मूढ़ और अज्ञानी ही पृथक् पृथक् क़हते हैं, परंतु पण्डितगण उन्हें एक ही मानते हैं।
जो फल कर्मसंन्यास से मिलता है, वही फल कर्मयोग से प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोग को जो एक जानता है, वही यथार्थ ज्ञाता है।
पण्डितजन केवल कर्म के संन्यास को ही संन्यास नहीं कहते, यदि योगी अनिच्छा से कर्म करे तो वह ब्रह्म ही हो जाता है।
शुद्धचित्त, मन को वश में करने वाले, जितेन्द्रिय, योग में तत्पर और सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित आत्मा को देखने वाले कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते।
तत्त्व को जानने वाला योगयुक्त आत्मवान् पुरुष "मैं कर्ता हूँ", ऐसा नहीं मानता, अपितु मनसहित एकादश इन्द्रियाँ कर्म करती हैं, ऐसा मानता है।
जो कर्म करने वाला सारे कर्म ब्रह्म में अर्पण कर देता है, वह उसी प्रकार पाप-पुण्य से लिप्त नहीं होता, जैसे जल में पड़ा हुआ सूर्य का बिम्ब उससे लिप्त नहीं होता।
योग के जानने वाले चित्तशुद्धि के निमित्त आशा (फलाशा) का त्यागकर शरीर, वचन, बुद्धि, इन्द्रिय और मन से कर्म करते हैं।
योगहीन मनुष्य कर्मों को फल की इच्छा से करता है, वह कर्मबीज से बँध जाता है और इसी से दुःख को प्राप्त होता है।
योगी को उचित है कि मन से सम्पूर्ण कर्मों को त्यागकर सुख से रहे तथा उत्तम नगर में आनन्द से वास करता हुआ भी न कुछ करे, न कराये और
ऐसा जाने कि न कोई क्रिया करता हूँ, न कोई कर्तृत्वपना मुझमें है, न मैं कोई निर्माण करता हूँ, न मेरा क्रिया के बीज से सम्बन्ध है, यह सब कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृति से स्वयं होता रहता है।
हे राजन्! मैं विभु आत्मा किसी के पुण्य और पापों को स्पर्श नहीं करता हूँ, मोह से मलिन बुद्धि वाले अज्ञानी ही मोह को प्राप्त होते हैं।
जिन्होंने विवेक के द्वारा स्वयं ही अपना अज्ञान नष्ट किया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम प्रकाशित होता है।
जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझमें ही है, जिनका चित्त मुझमें अत्यन्त आसक्त है और जो सदा मेरे परायण हैं, वे श्रेष्ठ ज्ञान द्वारा पाप का नाश करके मुक्त हो जाते हैं।
महात्मा पण्डितजन ज्ञानविज्ञानयुक्त ब्राह्मण, गौ, हाथी आदि प्राणी, चाण्डाल और श्वान - इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं।
जिनका मन समता में स्थित है, वे जीवन्मुक्त संसार और स्वर्ग को जीत चुके हैं, कारण कि ब्रह्म निर्दोष और समतायुक्त है, इस कारण वे ब्रह्म में स्थित रहते हैं।
जो महात्मा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में हर्ष-शोक नहीं करते, वे समत्वबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन ब्रह्म में स्थित तथा ब्रह्म के जानने वाले हैं।
वरेण्य बोले - भगवन्! तीनों लोकों तथा देवता और गन्धर्व आदि योनियों में यथार्थ सुख क्या है? हे विद्याविशारद! कृपाकर आप मुझसे यह वर्णन कीजिये।
श्रीगणेशजी बोले - जो अपनी आत्मा में ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं, उसी का नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकों में (वास्तविक) सुख नहीं है।
विषयों से उत्पन्न हुए सुख तो दुःख के ही कारण हैं और उत्पत्ति तथा नाश वाले हैं। तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते।
काम, क्रोध आदि का कारण उपस्थित रहने पर भी जो उनके आवेग को रोक लेता है तथा शरीर के प्रति अनासक्त होकर उन्हें जीतने का प्रयत्न करता है, वह बहुत काल तक सुख भोगता है।
जिनके हृदय में निष्ठा है, ज्ञान का प्रकाश है, सुख है तथा वैराग्य है, जो सब प्राणियों का हित करता है, वह निश्चय ही अक्षय ब्रह्म को प्राप्त करता है।
जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओं को जीत चुके हैं, जो शम और दम का पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियों को सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है।
सब बाह्य विषयों का त्यागकर एकान्त में आसन में स्थित हो, दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर कर प्राणायाम करे।
प्राण और अपान वायु के रोकने को प्राणायाम कहते हैं, बुद्धिमान् ऋषियों ने उसके तीन भेद कहे हैं।
प्रमाण के भेद से प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम - तीन प्रकार का है, बारह अक्षर का प्राणायाम लघु कहलाता है।
चौबीस अक्षरों का मध्यम और छत्तीस अक्षरों का उत्तम कहा जाता है।
सिंह, व्याघ्र अथवा मतवाले हाथी को जैसे मनुष्य नम्र करके अपने अधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायु को साधना चाहिये।
हे राजन्! जिस प्रकार अपने वश में हुए सिंहादि मृगों को सताते हैं, किंतु वश में करने वाले लोगों को पीड़ा नहीं देते, इसी प्रकार यह वायु प्राणायाम से स्थिर होकर पापों को भस्म करता है, परंतु शरीर को नहीं जलाता।
जिस प्रकार क्रम से मनुष्य सीढ़ियों पर चढ़ता है, इसी प्रकार योगी के लिये क्रम से प्राणापान को वश में करना उचित है।
पूरक-कुम्भक और रेचक का अभ्यास करके यह प्राणी इस जगत्में भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है।
बारह उत्तम प्राणायाम से उत्तम धारणा होती है, दो धारणा से योग सिद्ध होता है, योगी निरन्तर धारणा का अभ्यास करे।
हे राजन्! जो इस प्रकार साधना करते हैं, उन्हें त्रिकाल का ज्ञान हो जाता है और अनायास त्रिलोकी उनके वश में हो जाती है।
वह अपने अन्तरात्मा में सब जगत्को ब्रह्मरूप देखता है। इस प्रकार से कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फल के देने वाले हैं।
सब प्राणियों के हितकारी और कर्म का फल देने वाले एवं त्रिलोकी के व्यापक मुझ ईश्वर को जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं।
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