कस्यचित्पुण्यपापानि न स्पृशामि विभुर्नृप ।
ज्ञानमूढा विमुह्यन्ते मोहेनावृतबुद्धयः ॥
हे राजन्! मैं विभु आत्मा किसी के पुण्य और पापों को स्पर्श नहीं करता हूँ, मोह से मलिन बुद्धि वाले अज्ञानी ही मोह को प्राप्त होते हैं।
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