यथा यथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत् ।
तथा तथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित् ॥
जिस प्रकार क्रम से मनुष्य सीढ़ियों पर चढ़ता है, इसी प्रकार योगी के लिये क्रम से प्राणापान को वश में करना उचित है।
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