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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 36
ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि । एवं योगश्च संन्यासः समानफलदायिनौ ॥
वह अपने अन्तरात्मा में सब जगत्को ब्रह्मरूप देखता है। इस प्रकार से कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फल के देने वाले हैं।
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