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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 11
योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम् । बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते ॥
योगहीन मनुष्य कर्मों को फल की इच्छा से करता है, वह कर्मबीज से बँध जाता है और इसी से दुःख को प्राप्त होता है।
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