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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 21
श्रीगजानन उवाच- आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि । अविनाशि सुखं तद्धि न सुखं विषयादिषु ॥
श्रीगणेशजी बोले - जो अपनी आत्मा में ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं, उसी का नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकों में (वास्तविक) सुख नहीं है।
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