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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 1
वरेण्य उवाच- संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया । उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥
वरेण्य बोले - हे भगवन्! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् निष्कामभाव से कर्म करते-करते विशुद्ध चित्त होने पर कर्मत्याग करने) को ज्ञान का कारण कहकर फिर कर्मयोग को ज्ञान का कारण कहते हैं, इन दोनों में जो हितकारी हो, उसे कहिये।
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