पीडयन्ति मृगास्ते न लोकान्वश्यं गता नृप ।
दहत्येनस्तथा वायुः संस्तब्धो न च तत्तनुम् ॥
हे राजन्! जिस प्रकार अपने वश में हुए सिंहादि मृगों को सताते हैं, किंतु वश में करने वाले लोगों को पीड़ा नहीं देते, इसी प्रकार यह वायु प्राणायाम से स्थिर होकर पापों को भस्म करता है, परंतु शरीर को नहीं जलाता।
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