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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 10
कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा । त्यक्त्वाशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये ॥
योग के जानने वाले चित्तशुद्धि के निमित्त आशा (फलाशा) का त्यागकर शरीर, वचन, बुद्धि, इन्द्रिय और मन से कर्म करते हैं।
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