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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 12
मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत् । न कुर्वन्कारयन्वापि नन्दन्श्वभ्रे सुपत्तने ॥
योगी को उचित है कि मन से सम्पूर्ण कर्मों को त्यागकर सुख से रहे तथा उत्तम नगर में आनन्द से वास करता हुआ भी न कुछ करे, न कराये और
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