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गणेशगीता • अध्याय 4 • श्लोक 3
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न काङ्क्षति किंचन । मुच्यते बन्धनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान्सुखम् ॥
जो द्वन्द्व और दुःख को सहकर किसी से द्वेष नहीं करता और किसी बात की इच्छा नहीं करता, ऐसा प्राणी अनायास तत्काल कर्मबन्धन से सदा मुक्त हो जाता है।
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