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अध्याय 78 — अथ स्त्रीपुंससमायोगाध्यायः

बृहत्संहिता
25 श्लोक • केवल अनुवाद
विदूरथ राजा की अपनी त्री ने बेणी में छिपाये हुये शस्त्र से अपने पति (विदूरथ) को और काशिराज को विरक्त अपनी खी ने विष मिले हुये नूपुर से अपने स्वामी (काशिराज) को मारा।
इस तरह विरक्त खियाँ प्राणनाश करने वाले अनेक दोष उत्पत्र करती हैं, फिर अन्य दोष कहने की तो बात ही क्या है? इसलिये पुरुषों को प्रयत्नपूर्वक खियों की विरक्तता और अनुरक्तता को परीक्षा करनी चाहिये।
अनुरक्त खियों के समस्त भाव (शरीर कांपना, मुख सूखना, मुख पीला पड़ जाना आदि) कामजनित स्नेह को कहते हैं। वह अपनी नाभि, भुज, छाती और भूषण दिखाती है तथा वस्त्र पहनना, केश बाँधना, बालों का छखोलना, भौहें चढ़ाकर कम्पित कटाक्ष से देखना- ये सब चिह प्रकाशित करती हैं।
बहुत जोर से खखारना, शब्द के साथ हंसना, प्रिय के शय्या और आसन के समीप जाना, अपने अंगों का शब्द करना, जम्भाई लेना, छोटी-सी वस्तु को प्रिय से माँगना, प्रिय के सम्मुख में बालकों का आलिङ्गन करके चूमना, प्रिय के सामने सखो को देखना, दूसरी तरफ देखते हुये प्रिय को देखना,
प्रिय के गुणों का बखान करना, कान खुजाना-ये सब अनुरक्त खो की चेष्टायें हैं। वह अनुरक्त स्री प्रिय वचन बोलती है, प्रिय को अपना धन देतो है, देखकर प्रसत्र होती है और क्रोधरहित होकर गुणों को कहकर प्रिय के दोषों को छिपाती है।
प्रिय के परदेश जाने से दुःखी होती है। स्तन- स्पर्श, अघरपान, आलिङ्गन और चुम्बन करने देती है। ये सब अनुरक्त खियों की चेष्टायें, हैं।
भुकुटी चढ़ाना, पति की तरफ से मुँह फेर लेना, पति के किये हुये कार्यों को भूल जाना, पति का अनादर करना, बड़ी कठिनता से सन्तुष्ट होना, पति के शत्रु से मैत्री करना, कठोर बचन कहना,
पति को छूकर या देखकर शरीर को कंपाना, अभिमान करना, जाने के लिये तैयार पति को नहीं रोकना, पति को चूमने पर मुख पोंछ लेना, पति के सोने से पहले सोना और बाद में जागना- ये सब विरक्त खो की चेष्टायें हैं।
त्रियों के परपुरुष से सम्बन्ध कराने में भिखारिन, संन्यासिन, दासी, घाई, धोबिन, मालिन, दुष्ट स्वभाव वाली सही, सखी, नापन- ये दूतो होती है।
ये दूतियाँ कुल के मनुष्यों का नारा करने के कारण हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक वंश, यश और मान बढ़ाने के लिये उन दूतियों से खियों को बचाना चाहिये।
जो पहले सुरत की इच्छा से रहित, किन्तु स्मरकथा को त्यागती भी नहीं है, लज्ला से युत आलस्य वाली, रति के मध्य में लज्जारहित, बाद में लज्जा से नतमस्तक वाली, आदर से बार-बार अनेक प्रकार के भावों के साथ रति करने वाली तथा पुरुष के भावों को जान कर सुख-दुःख में साथ निभाने वाली त्री के साथ रति करना चाहिये ।
लियों के यौवन, रूप, घेष, चतुरता, ससशास्रोक्त कलाओं में कुशलता, बिलास (मधुर वचन, कटाक्ष-निश्क्षेपण आदि) कुणे हैं। चतुर पुरुष के लिये गुणों से युक्त स्त्री रत्नस्वरूपा तथा गुणरहित ही व्याधिरूपा होती है।
वारी बोलती बोलने जाने और लिखियों के साथ नि अंगों के (क) को आचीत नहीं करनी चाहिये के लिये एकान्त में पेड़ी सी अन्य कार्य कर स्मरण नको, क्योंकि कामदेव का मन ही मूल है। पर अन्यत्र रहने से रति का सुख नहीं प्राप्त होता है।
पुरुष के साथ श्वास छोड़ने वाली, अपने बाहुरूप तकिये पर पति का शिर रखकर उसकी छाती से अपने स्तन को लगाने में चतुर, सुगन्धित केश वाली, पति के सो जाने पर सोने बालो और पहले जागने वाली ये गुणवती खी के लक्षण हैं।
दुष्ट स्वभाव वाली तथा रति के समय की पीड़ा को नहीं सहन करने वालो खी को त्याग देना चाहिये। जिनके ऋतु का रक्त काला, नीला, पीला या ताम्रवर्ण हो, ये भी श्रेष्ठ त्रियाँ नहीं होती है।
साथ ही बहुत सोने वाली, बहुत रक्तपित्त वालो, प्रवाहिनी, अधिक चात तथा कफ बाली, अधिक खाने बाली, पसीने से युक्त शरीर वाली, छोटे केश बाली
दुष्ट स्वभाव वाली तथा रति के समय की पीड़ा को नहीं सहन करने वालो खी को त्याग देना चाहिये। जिनके ऋतु का रक्त काला, नीला, पीला या ताम्रवर्ण हो, ये भी श्रेष्ठ त्रियाँ नहीं होती है। साथ ही बहुत सोने वाली, बहुत रक्तपित्त वालो, प्रवाहिनी, अधिक चात तथा कफ बाली, अधिक खाने बाली, पसीने से युक्त शरीर वाली, छोटे केश बाली, सफेद केश बाली, ढोले मांस बाली, बड़े पेट वाली, अस्पष्ट शब्द वाली, खीलक्षणाध्याय में कथित अशुभ लक्षणों से युत त्रियों के साथ भो रति नहीं करना चाहिये।
जो ऋतु का रक्त खरगोश के रक्त लाख के समान और धोने से छुट जाय, वह शुद्ध होता है। जो रक्त शब्द और पीड़ा से
रहित होकर तीन दिन के बाद बन्द हो जाय, वह पुरुष के संयोग होने से गर्भ को धारण करता है।
रजस्वला त्रो को तीन दिन तक स्नान, माला और अनुलेपन का सेवन नहीं करना चाहिये। चौथे दिन शास्त्रोक्त उपदेश के अनुसार स्नान करना चाहिये।
पुष्यस्नानाध्याय में जो औषधियाँ कही गई हैं, उनको जल में डालकर उस जल से और जो वहाँ पर मन्त्र कहा गया है, उसो मन्त्र से स्नान करना चाहिये।
प्रऋतु से सम रात्रियों में पुरुष और विषम रात्रियों में त्रो को उत्पत्ति होती है। दूरस्थित सम रात्रियों ( छठी, आठवीं आदि सम रात्रियों) में दीर्घायु, सुन्दर और सुखो पुरुष उत्पन होता है।
त्री के दक्षिण पार्श्व में गर्भ हो तो पुरुष, वाम पार्श्व में गर्भ हो तो कन्या, दोनों तरफ हो तो यमल और पेट के बीच में गर्भ हो तो नपुंसक सन्तान होती है।
जिस समय केन्द्र (१/४/७/१०) और त्रिकोण (५/९) स्थानों में शुभ ग्रह हों, लग्न, चन्द्र-दोनों शुभग्रहों से युत हों, तीसरे, ग्यारहवें और छठे में पाप ग्रह हों, उस समय तथा जातकोक्त पुञ्जन्म योग में स्त्रीप्रसीरु करना चाहिये ।
पुरुषो नरः स्त्रिया योषित ऋतुसमये गर्भाधानसमये कथञ्चित् कथमपि नखदशनविक्षतानि न कुर्यात् कारयेत्। अपिशब्दधायें। ऋतू रजः। दश पट् च षोडशवासराणि षोडशदिनानि भवन्ति। तत्र ऋतौ सति प्रथममादौ निशात्रितयं रात्रित्रितयं न गम्यम्। यतस्तत्र गर्भः खब- तोति ।
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