स्त्रीणां गुणा यौवनरूपवेषदाक्षिण्यविज्ञानविलासपूर्वाः । श्री रत्नसंज्ञा च गुणान्वितासु श्रीव्याचयोऽन्याक्षतुरस्य पुंसः ॥
लियों के यौवन, रूप, घेष, चतुरता, ससशास्रोक्त कलाओं में कुशलता, बिलास (मधुर वचन, कटाक्ष-निश्क्षेपण आदि) कुणे हैं। चतुर पुरुष के लिये गुणों से युक्त स्त्री रत्नस्वरूपा तथा गुणरहित ही व्याधिरूपा होती है।
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