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बृहत्संहिता • अध्याय 78 • श्लोक 5
इमां च विन्द्यादनुरक्तचेष्टां प्रियाणि वक्ति स्वधनं ददाति । विलोक्य संहष्यति वीतरोषा प्रमार्टि दोषान् गुणकीर्तनेन ॥
प्रिय के गुणों का बखान करना, कान खुजाना-ये सब अनुरक्त खो की चेष्टायें हैं। वह अनुरक्त स्री प्रिय वचन बोलती है, प्रिय को अपना धन देतो है, देखकर प्रसत्र होती है और क्रोधरहित होकर गुणों को कहकर प्रिय के दोषों को छिपाती है।
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