न प्राम्यवर्णैर्मलदित्यकाया निन्द्याद्वसम्वन्धिकयां च कुर्यात् ।
न धान्यकार्यस्मरणं रहःस्था मनरो हि मूलं हरदग्यमूर्तेः ॥
वारी बोलती बोलने जाने और लिखियों के साथ नि अंगों के (क) को आचीत नहीं करनी चाहिये के लिये एकान्त में पेड़ी सी अन्य कार्य
कर स्मरण नको, क्योंकि कामदेव का मन ही मूल है। पर अन्यत्र रहने से रति का
सुख नहीं प्राप्त होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।