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बृहत्संहिता • अध्याय 78 • श्लोक 13
न प्राम्यवर्णैर्मलदित्यकाया निन्द्याद्वसम्वन्धिकयां च कुर्यात् । न धान्यकार्यस्मरणं रहःस्था मनरो हि मूलं हरदग्यमूर्तेः ॥
वारी बोलती बोलने जाने और लिखियों के साथ नि अंगों के (क) को आचीत नहीं करनी चाहिये के लिये एकान्त में पेड़ी सी अन्य कार्य कर स्मरण नको, क्योंकि कामदेव का मन ही मूल है। पर अन्यत्र रहने से रति का सुख नहीं प्राप्त होता है।
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