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बृहत्संहिता • अध्याय 78 • श्लोक 4
उच्चैः ष्ठीवनमुत्कटप्रहसितं शय्यासनोत्सर्पणं जगात्रास्फोटनजृम्भणानि सुलभद्रव्याल्पसम्प्रार्थना । बालालिङ्गनचुम्बनान्यभिमुखे सख्याः समालोकनं दृक्पातश्च पराङ्मुखे गुणकथा कर्णस्य कण्डूयनम् ॥
बहुत जोर से खखारना, शब्द के साथ हंसना, प्रिय के शय्या और आसन के समीप जाना, अपने अंगों का शब्द करना, जम्भाई लेना, छोटी-सी वस्तु को प्रिय से माँगना, प्रिय के सम्मुख में बालकों का आलिङ्गन करके चूमना, प्रिय के सामने सखो को देखना, दूसरी तरफ देखते हुये प्रिय को देखना,
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