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बृहत्संहिता • अध्याय 78 • श्लोक 18
शशशोणितसङ्काशं लाक्षारससन्निकाशमथवा यत् । प्रक्षालितं विरज्यति यच्चासृक् तद्भवेच्छुद्धम् ॥
जो ऋतु का रक्त खरगोश के रक्त लाख के समान और धोने से छुट जाय, वह शुद्ध होता है। जो रक्त शब्द और पीड़ा से
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