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बृहत्संहिता • अध्याय 78 • श्लोक 11
आदौ नेच्छति नोज्झति स्मरकथां व्रीडाविमिश्रालसा ॥० मध्ये हीपरिवर्जिताभ्युपरमे लज्जाविनम्रानना । भावैर्नेकविधैः करोत्यभिनयं भूयश्च या सादरा बुद्ध्वा पुम्प्रकृतिं च यानुचरति ग्लानेत चेष्टितैः ॥
जो पहले सुरत की इच्छा से रहित, किन्तु स्मरकथा को त्यागती भी नहीं है, लज्ला से युत आलस्य वाली, रति के मध्य में लज्जारहित, बाद में लज्जा से नतमस्तक वाली, आदर से बार-बार अनेक प्रकार के भावों के साथ रति करने वाली तथा पुरुष के भावों को जान कर सुख-दुःख में साथ निभाने वाली त्री के साथ रति करना चाहिये ।
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