Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 55 — अथ वृक्षायुर्वेदाध्यायः
बृहत्संहिता
31 श्लोक • केवल अनुवाद
वापी, कूप, तालाब आदि जलाशयों के प्रान्त छायारहित हों तो सुन्दर नहीं होता; अतः जलाशयों के किनारे पर बागीचा लगाना चाहिये ।
सभी वृक्षों के लिये कोमल भूमि अच्छी होती है। जिस भूमि में बागीचा लगाना हो, उसमें पहले तिल बोमा चाहिये और जब वे तिल फूल जायें तब उनको उसी भूमि में मर्दन कर देना चाहिये। यह भूमि का प्रथम कर्म है।
पहले बागीचे या घर के समीप में शुभ करने वाले निम्ब, अशोक, पुत्राग, शिरीष, प्रियङ्गु (ककुनी = कौनी)- इन वृक्षों को लगाना चाहिये।
कटहल, अशोक, केला, जामुन, बडहर, दाडिम, दाख, पालीवत, बिजौरा, अतिमुक्तक- इन वृक्षों की शाखाओं को लेकर गोबर से लीप कर
कटे हुये विजातीय वृक्ष की मूल या शाखा पर लगाना चाहिये। यही कलम लगाने का प्रकार है।
अजातशाखा अर्थात् कलमी से भिन्न वृक्षों को शिशिर (माघ-फाल्गुन) में, कलमी वृक्षों को हेमन्त (मार्गशीर्ष पौष ) में और लम्बी-लम्बी शाखा वाले वृक्षों को वर्षा (श्रावण-भाद्र) में लगाना चाहिये।
घृत, खस, तिल, शहद, विडङ्ग (वायविडङ्ग), दूध, गोबर-इन सबों को पीसकर मूल से लेकर अग्रभागपर्यन्त लेप कर वृक्ष को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर लगाना चाहिये।
पवित्र होकर स्नान, चन्दन आदि से वृक्ष की पूजा करके उसे दूसरे स्थान पर लगाना चाहिये। इस तरह लगाने से अपने पूर्व पत्रों से युत वृक्ष ही लग जाता है, अर्थात् सूखता नहीं है।
उपर्युक्त प्रकार से लगाये गये वृक्षों को ग्रीष्म ऋतु में सायं और प्रातः, शीत काल में एक दिन के अन्तर से एवं वर्षा ऋतु में भूमि के सूखने पर सींचना चाहिये।
जामुन, वेंत, वानीर (एक प्रकार का वेंत), कदम्ब, गूलर, अर्जुन, बिजौरा, दाख, बडहर, दाडिम, वङ्गुल (तेन्दुआ तिनिस)
नक्तमाल (करञ्ज), तिलक, कटहल, तिमिर, अम्बाडा- ये सोलह वृक्ष अनूप (बहुत जल वाले) देश में पाये जाते हैं।
एक वृक्ष से दूसरा वृक्ष बीस हाथ की दूरी पर लगाना उत्तम, सोलह हाथ पर मध्यम और बारह हाथ पर लगाना अधम होता है।
यदि एक वृक्ष दूसरे वृक्ष के समीप हो, परस्पर स्पर्श करता हो या दोनों की जड़ें इकट्ठी हों तो वे वृक्ष पीड़ित होते हैं और अच्छी तरह फल नहीं देते।
अधिक शीत, वायु और धूप लगने से वृक्षों को रोग हो जाता है। रोगी वृक्षों के पत्ते पीले पड़ जाते हैं। उनके अंकुर नहीं बढ़ते, डालियाँ सूख जाती हैं और उनसे रस टपकने लगता है।
इन रोगी वृक्षों की चिकित्सा करनी चाहिये। पहले वृक्ष का जो अंग पूर्वोक्त विकार- युत हो, उसको शस्त्र से काट डालना चाहिये। फिर वायविडङ्ग, घृत और पङ्क ( कीचड़ = कीच ) को मिला कर वृक्षों में लेप करना चाहिये। बाद में दूधमिश्रित जल से उसे सींचना चाहिये।
वृक्ष में फल न लगें तो कुलथी, उड़द, मूंग, तिल, जौ-इन सबको दूध में डाल कर गर्म करने के पश्चात् उस दूध को उण्ढ़ा करके उससे फल और फूलों की वृद्धि के लिये वृक्षों को सीचना चाहिये।
भेड़ और बकरी की पेंगन ( भेड़ारी) का चूर्ण दो आढ़क, तिल एक आढ़क, सत्तू ( सतुआ) एक प्रस्थ, जल एक द्रोण, गौ का मांस एक तुला-इन सबको मिलाकर एक पात्र में
सात रात तक रखने के पश्चात् फल, फूलों की वृद्धि के लिये उससे वृक्ष, गुल्म और लताओं को सींचना चाहिये।
किसी वृक्ष के बीज को घृत लगाये हुये हाथ से चुपड़ कर दूध में डाल दे। इसी प्रकार लगातार दश दिन तक करता रहे। बाद में उसको गोबर से अनेक बार मल कर रूखा करके सूकर और हिरण
के मांस की धूप देने के बाद मांस और सूकर की चों- सहित उस बीज को तिल बोकर शुद्ध की हुई भूमि में लगाकर दुग्धमिश्रित जल से सींचे तो निश्चित ही फूलयुत वृक्ष उत्पन्न होता है।
सड़े हुए मांस से युत धान, उड़द, तिल-इनका चूर्ण और सत्तू- इन सबसे सींच कर हल्दी का धूप देने से अत्यन्त कठोर इमली का बीज भी शीघ्र ही अंकुरित हो जाता है।
कपित्थ (कैथ) के बीज की शीघ्र उत्पत्ति के लिये विष्णुक्रान्ता, आँवला, धव, बसा- इनकी जड़ः पत्तों से युत वेंत और सूर्यमुखी तथा निसोत, अतिमुश्कक (तेन्दुआ = तिनिस)- इनकी जड़;
इन आठ मूलों को दूध में डालकर भरपूर गर्म करे। बाद में उस दूध को ठण्ड्रा कर उसमें कैच के बीज को डाल दे। दोनों हाथों से सौ बार ताली बजाने में जितना समय लगता है, उतनी देर तक उस बीज को दूध में रहने दे। बाद में उसको दूध से निकाल कर धूप में सुखा ले।
इस तरह प्रतिदिन एक मास तक करता रहे और बाद में उस बीज को बो दे। एक हाथ व्यास वाला वृत्त के आकार का दो हाथ गहरा एक गड्डा खोद कर उसको पूर्वकचित रीति से दूधमिश्रित जल से पूर्ण करे।
जब वह सूख जाय तब उसको अग्नि से जला दे। बाद में शहद और घृत से युक्त भस्म से उस गड्ढे को लोप दे। फिर मृत्तिकायुत उड़द, तिल और जी के चूर्ण से गड्ढे को भरकर मछली और मांसयुत जल से उसको ऊपर से तब तक ठोके
जब तक कि वह कठिन न हो जाय। इसके पश्चात् उस पर चार अंगुल नीचे पूर्व में सिद्ध किया हुआ कैथ काबीज रोप कर मछली और मांस के जल से सींचे तो शीघ्र ही सुन्दर पत्तों से युत, मण्डप को ढकने वाली वल्ली उत्पन्न हो जाती है।
अङ्कोल वृक्ष के फल के कल्क या तेल से अथवा श्लेष्मातक (लसोड़े) के फल, कल्क या तेल से सौ बार भावना देकर ओलों से भीगी हुई मिट्टी में जिसे बीज को बोया जाता है
वह उसी क्षण उत्पन्न हो जाता है तथा उसकी शाखा फलों के भार से शुक जाती है। इसमें किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं करना चाहिये अर्थात् ऐसा निश्चित ही होता है।
बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि छिलका उतारे हुए लसोड़े के बीज को अङ्कोलफल के भीतर के जल से भावना देकर छाया में सुखाता जाय।
इस तरह सात बार करने के पश्चात् उसको भैंस के गोबर से घिस कर भैंस के सूखे गोबर के ढेर पर रख दे। तत्पश्चात् ओलों से भींगी हुई मिट्टी में उन बीजों को बोने पर एक दिन में ही फलयुत पौधा लग जाता है।
तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, मूल, विशाखा, पुष्य, श्रवण, अश्विनी, हस्त-इन नक्षत्रों को दिव्य दृष्टि वाले मुनियों ने वृक्षों का रोपन करने के लिये उत्तम कहा है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें